कर्म योग का अर्थ है यानि अपने कर्म में लीन होना है। कर्मयोग के माध्यम से हमें अपनी जीवात्मा से जुड़ सकते है। कर्मयोग हमारे आत्मज्ञान को जागृत करता है। जिसके बाद हम अपने जीवन के उद्देश्यों को भलीभांति प्राप्त कर सकते है। कर्मयोग में हम अपने कर्मों से ईश्वर को प्राप्त करने की कोशिश करते है। कर्मयोग का वर्ण श्रीमद्भगवद्गीता में विस्तार से किया गया है। यह योग गृहस्थ और कर्मठ लोगों के लिए उपयुक्त है। हम सभी किसी ना किसी कार्य में लगे हुए है, जिसके कारण हमें अपने अंदर की शक्तियों को खो देते हैं, क्योंकि हम इस दौरान अपने कर्मों के रहस्य को नहीं जान पाते है। हमारे जीवन, समाज और राष्ट्र के लिए हमारा कर्म करना बहुत की जरूरी है। हमारे कर्मों से ही हमारी और हमारे समाज का विकास होता है। 

आपको बता दूं हमारे द्वारा मानसिक व शारीरिक क्रिया करना हमारा कर्म कहलाता है। हमारे किसी क्रिया का परिणाण ही हमारा कर्म है। हमारे द्वारा जो कुछ भी किया जाता है, चाहे हमारा सोचना हो या हमारा कहना हो। इन सबका हमारे ऊपर एक गहरा प्रभाव होता है। जिसका हमें सही समय पर सही मात्रा में प्रतिफल मिलता है। कर्मयोग में कर्म शब्द कृ धातु से बना हुआ है। जब हम कृ धातु में मन प्रत्यय लगाते है तो कर्म शब्द की उत्पत्ति होती है। कर्म का मूल अर्थ है- क्रिया करना, व्यापार करना आदि। हमारे जिस क्रिया में हमारा फल निहित हो वहीं हमारा कर्म है। कर्म करना हर मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। कर्म के बिना हमारा जीवित रहना असंभव है। हमारे कर्मों के संदर्भ में गीता में एक श्लोक लिखा गया है।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् 

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:।

अर्थ- इस विषय पर किसी भी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता है कि मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता है क्योंकि सभी मानव प्रकृतिजनित गुणों के कारण कर्म करने के लिए बाध्य होते हैं। हमें यानि मनुष्य को ना चाहते हुए भी कर्म करने होते हैं। हमारे सभी कर्म बंधन के कारण होते हैं। जिस प्रकार मनुष्य में संस्कार उत्पन्न होते हैं, ठीक उसी प्रकार मनुष्य इन संस्कारों के कारण जीवन-मरण के चक्र में फंस जाता है। हमारे द्वारा अनासक्त भाव से किए गए कर्म हमें मोक्ष की प्राप्ति कराते है।

हमारे कर्मों की कुशलता ही हमारा कर्मयोग है। कर्मयोग में मानव बिना कर्म बंधन में बंधे अपना कर्म करता रहता है। हमें कर्म करते समय अपनी फलासक्ति का त्याग करना चाहिए क्योंकि तभी हम मुक्तिदायक होते हैं। हमारे द्वारा कर्तव्य की भावना से किए गए हमारे कर्म हमें कर्मयोग सीखता है।

कर्म योग के माध्यम से हमारे अंदर भक्ति भाव उत्पन्न हो जाता है। हम जो भी कर्म करते हैं वह परमात्मा को अर्पित होता है। कर्मयोग की साधना में जब हम उच्च अवस्था में पहुंचते है, तो हमारे अंदर स्वयं कर्ता की भावना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार कर्मयोग हमारी साधना से  हमारी लौकिक व पारमार्थिक दोनों पक्षों का उत्थान करती है। कर्म योग के मार्ग से हम गृहस्थ जीवनयापन करते साधना से मुक्ति प्राप्त कर सकते है। कर्मयोग मुख्य रूप से दो प्रकार के माने गए है- 

1- विहित कर्म- विहित कर्म यानि अच्छे कर्म व सुकृत कर्म है। विहित कर्म के चार भेद होते हैं। जो नित्यकर्म, नैमित्तिक कर्म, काम्य कर्म, प्रायश्चित कर्म हैं। नित्य कर्म का अर्थ है- हमारे द्वारा प्रतिदिन किए जाने वाले कर्म जैसे- पूजा, अर्चना, प्रार्थना इत्यादि। नैमित्तिक कर्म का अर्थ है- जो किसी प्रयोजन के लिए किए जाते है। जैसे त्योहार, पर्व, मृत्यु आदि। काम्य कर्म का अर्थ है- जो कर्म कामना या किसी प्रयोजन के लिए किए जाते हैं। जैसे नौकरी प्राप्ति हेतु, पुत्र प्राप्ति हेतु,  इत्यादि। प्रायश्चित कर्म का अर्थ है- हमारे द्वारा किसी अनैतिक कार्य या पाप के लिए प्रायश्चित करना हमारा प्रायश्चित कर्म है।

2- निशिद्ध कर्म- निशिद्ध कर्म यानि कर्म शास्त्र के अनुकूल कर्म नहीं करना है। जैसे चोरी, हिंसा, झूठ इत्यादि कर्म करना निशिद्ध कर्म है। जब भी हम कर्म करते है तो हमारा मन हमें उसे करने या ना करने के लिए प्रेरित करता है। हर व्यक्ति अपनी आत्मा के अनुसार कर्म करता है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज को नहीं सुनते हुए कर्म करता है, वह निशिद्ध कर्म है।

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