भक्ति योग यानि निष्काम के भाव से आत्मसमर्पण करना है। भक्ति और योग शब्द संस्कृत भाषा के शब्द हैं। भक्ति का अर्थ है- दिव्य प्रेम, आत्मा से प्रेम और योग का अर्थ है- जुड़ना यानि भक्ति योग का अर्थ है- अपनी आत्मा से प्रेम कर उससे जुड़ना है। भक्ति का मतलब यह नहीं है कि हम किसी की भक्ति करें या हम पहले से कर रहे है, बल्कि भक्ति वह है जो हम वर्तमान में है। हमारी चेतना, हमारा ज्ञान, हमारा साक्षात्कार और हमारा सर्वयापी प्रेम से मिलना ही भक्ति योग है। भक्ति योग हमारा परमात्मा के साथ एकरूपता है।

भक्ति शब्द से आप पहले ही परिचित होंगे। हमारे यहाँ मंदिर में जाना, पूजा पाठ करना और ईश्वर की आराधना करना इत्यादि भक्ति कहलाती है। भक्ति योग हमें प्रेम की सर्वोच्च पराकाष्ठा पर लेकर जाती है। भज् सेवायाम धातु से क्तिन प्रत्यय लगाकर भक्ति शब्द का निर्माण हुआ है। भक्ति योग को हमारे लिए सबसे अधिक उपयुक्त माना गया है। भक्ति योग हमारी चित्त को आसानी से एकाग्र करती है। ईश्वर के प्रेम में डूब जाना ही भक्ति है। हर व्यक्ति ईश्वर की भक्ति में किसी ना किसी प्रयोजन के कारण जुड़ता है। गीता में भक्ति को 4 प्रकार का बताया गया है। जो आर्त भक्त, जिज्ञासु भक्त, अर्थाथी भक्त और ज्ञानी भक्त हैं।

भक्ति की परिभाषा देना अपने आप में कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि भक्ति को सिर्फ महसूस किया जा सकता है। हम अपने हर काम में भक्ति में लीन हो सकते है। भक्ति एक दिव्य प्रेम है जो हमें निखारता, बदलती, जगाती है और हमारे अस्तित्व की गहराइयों को छूती है। भक्ति हमें बंधनों से मुक्ति कराती है और हमारे भीतरी द्वार खोलती है। भक्ति हमारे आत्म का वह प्रकाश है जो हमारे नेत्रों को दिव्य प्रेम प्रदान करता है।  भक्ति ज्ञान, प्रेम, परमात्मा और ईश्वर का प्रतिबिम्ब है।

जब भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था, तब द्रोपदी ने आर्त भाव में श्रीकृष्ण को पुकारा था।  इसके बाद श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की रक्षा करते हुए शरण दी। आर्त भक्त वह है जब हम किसी गंभीर संकट में फंस जाते है और अपने आर्त भाव से अपनी आत्मा को पुराकरते है। इसी प्रकार भक्ति का एक स्वरूप जिज्ञासु भक्त भी है। जिज्ञासु यानि किसी चीज को जानने की इच्छा रखने वाले भाव। जब हम अपनी आत्मा को जानने की इच्छा रखते है तो हम जिज्ञासु भक्त कहलाते है। जब हम किसी सांसारिक वस्तु, मकान, जमीन इत्यादि को अपना बनाने के लिए अपने आराध्य को भजते है, तो हम अर्थाती भक्त होते है। इसी प्रकार जब हम अपने आत्म कल्याण के लिए अपने आराध्य को भजते है, तो हम ज्ञानी भक्त कहलाते है। ज्ञानी भक्त सभी भक्तों में से श्रेष्ठ माना जाता है।

इसी प्रकार नवधा भक्ति है, जिसे भक्ति योग का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष माना गया है। इस नवधा भक्ति को नौ प्रकार से भगवानों की भक्ति में बांटा गया है। जैसे श्रवण भक्ति यानि परमपिता परमेश्वर, कीर्तन भक्ति यानि दिव्य गुणों का गायन करना, स्मरण भक्ति यानि सर्वत्र ईश्वर का स्मरण करना,  पादसेवन भक्ति यानि ईश्वर की चरणों की सेवा करना, अर्चन भक्ति यानि मानसिक रूप से अपने आराध्य को पूजना, वंदन भक्ति यानि मन में ईश्वर की वंदना करना, दास्य भक्ति यानि अपने को ईश्वर का दास समझना, साख्य भक्ति यानि अपने आराध्य को अपना मित्र समझना, आत्म निवेदन भक्ति यानि अपने को ईश्वर को अर्पण करना। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद, सेवन, अर्चन, दास्य, साख्य भक्ति के भेद हैं।

जब हमारी नवधा भक्ति अपने चरम पर होती है, तब रागात्मिका भक्ति शुरु होती है। हम अपने अलौकिक प्रेम से अपने आराध्य का अनुभव करते है। हमारा आराध्य की हमें ईश्वर से मिलता है। जब हम रागात्मिका भक्ति के चरम पर होते है, तो हमारी पराभक्ति उत्पन्न होती है। यह हमारी उत्कृष्ट पराकाष्ठा है। इस भक्ति में हमारी आराध्य एक होकर हमारी आत्मा का साक्षात्कार करती है। जब हम अपनी आत्मा का साक्षात्कार करने लगते हैं, तो हम भक्तियोग की गहराई में जाने लगते है। 

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