ज्ञान योग यानि स्वयं के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही ज्ञान योग है। इसे आप अपने परिवेश के अनुभव से समझ सकते है। ज्ञानयोग के माध्यम से हम वास्तविक सत्य को जान पाते है। ज्ञान योग मायावाद के असल तत्व को जानकर हमें अपनी वास्तविकता और वेदांत को जानने का मौका देती है। ज्ञानयोग ध्यानात्मक सफलता की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से हम अपनी आंतरिक प्रकृति के पास आकर अपनी आत्मिक ऊर्जा को महसूस कर सकते है।

ज्ञानयोग के लिए हमें साधनों व गुणों की जरूरत होती है। ज्ञानयोग के दो साधना बताएँ गए हैं, जो इस प्रकार हैं-

1- बहिरंग साधना- जब हम ज्ञानयोग के मार्ग पर चलते हैं, तो हमें कई नियमों का पालन करना पड़ता है, इन्हीं नियमों को बहिरंग साधन कहते है। बहिरंग साधन की संख्या चार होने की वजह से इसे साधन चतुश्टय भी कहते है। पहला बहिरंग साधना हमारा विवेक है- विवेक यानि अच्छा-बुरा, सही-गलत, नित्य-अनित्य है। विवेक के अनुसार सिर्फ हमारी आत्मा यानि ब्रह्मा ही सत्य है बाकि सब असत्य है। हमें अपने विवेक को स्थिर रखने के लिए राजसिक व तामसिक भोजन छोड़कर सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। इससे हमारी आत्मा पवित्र होगी। दूसरी बहिरंग साधना वैराग्य है- वैराग्य का अर्थ है- पारलौंकिक और इहलौंकिक इच्छा का पूर्ण रूप से परित्याग कर देना। वैराग्य के बिना हमारी साधना सफल नहीं हो सकती है। इसलिए हमें ज्ञानयोग को जानने के लिए अपने अपने वैराग्य को जानना जरूरी है। तीसरा बहिरंग साधना षट्सम्पति है- इसमें कहा गया है कि ज्ञानयोग के लिए हमें 6 बातों का पालन करना आवश्यक है। इन्हीं 6 बातों के गुणों से हम ज्ञानयोग को समझ सकते है। ये गुण- शम, दम, उपरति, तितिक्षा, क्षद्धा, समाधान हैं। शम यानि शमन व शांत करना। अपने इंद्रियों का निग्रह कर अपने मन को शांत करना यानि हमारे मन का निग्रह शम है। दम का अर्थ है- दमन करना यानि अपने इंद्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर अपनी आत्मा में स्थिर करना दम है। उपरति यानि अपने कर्मफलों का परित्याग करते हुए बिना किसी आशा में अपने कर्म करते रहना है।  तितिक्षा यानि जब हम साधना के मार्ग पर चलते है तो हमें कई कष्टों का सामना करना पड़ता है। इन कष्टों को बिना किसी प्रतिक्रिया प्रसन्नतापूर्वक सहन कहते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करना तितिक्षा है। क्षद्धा का अर्थ है- अपने गुरु व अपने शास्त्रों में अटूट निष्ठा व विश्वास ही क्षद्धा है। समाधान यानि अपने चित्त को सर्वदा अपनी आत्मा में स्थिर व एकाग्र करना और हमारे चित्त की इच्छापूर्ति करना है। चौथा बहिरंग साधना मुमुक्षुत्व है- इस संसार को पार कर मोक्ष प्राप्त करना हमारी तीव्र अभिलाषा ही मुमुक्षुत्व है। हमारे विवेक से हमारा वैराग्य और हमारे वैराग्य से हमारी मोक्ष की इच्छा प्रबल होती है।

2- अंतरंग साधना-  ज्ञानयोग में जितना योगदान बहिरंग साधना का होता है, उतना ही योगदान अंतरंग साधना का भी होता है। जिस प्रकार बहिरंग साधना के चार प्रकार है, उसी प्रकार अंतरंग साधना के भी 4 प्रकार है। पहला अंतरंग साधना श्रवण है- हमारी आत्मा के बारे में हमारे समाज में कई मत हैं। जिसके कारण हमारे मन में कई प्रश्न उत्पन्न होते हैं। इन्हीं सवाल को दूर करने के लिए श्रवण एक मात्र उपाय है। श्रवण का अर्थ है- अपने मन के सभी संशय दूर कर अपनी आत्मा व गुरु को सुनना है। दूसरी अंतरंग साधना मनन है- जब हम कोई कार्य करते हैं, तो हमें मनन करने की जरूरत होती है। मनन यानि अपनी आत्मा से सवाल-जवाब करना और उसके बाद उस कार्य को आगे बढ़ना होता है। इस लिए ज्ञानयोग में मनन का अपना विशेष महत्व है। तीसरी अंतरंग साधना निदिध्यासन है-  निदिध्यासन का अर्थ है- अपना आत्म साक्षात्कार करना यानि अपनी देह से अपनी भावना हटाकर अपनी आत्मा का अनुसरण करना निदिध्यासन है। निदिध्यासन के यम, नियम, मौन, त्याग, देश, काल, आसन, मूलबंध, देहस्थिति, कस्थिति, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि अंग माने जाते है। चौथी अंतरंग साधना समाधि है-  समाधि यानि ध्येय व ध्यान का भेद मिटकर  अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाना समाधि है। जब हम अपनी आत्मा में खो जाते है तो हम समाधि में चले जाते है। 

इस लेख के माध्यम से आप ज्ञानयोग के बार में थोड़ा बहुत जान गए होंगे। अगर आपको ज्ञानयोग और मेडिटेशन के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करनी है तो आपको हमारा eka Meditation App डाउनलोड करना की जरूरत है। जहाँ आपको योग और मेडिटेशन के बारे में विस्तार पूर्ण जानकारी मिलेगी। 

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