जानिए ध्यान का अर्थ और महत्व क्या है ?

जब कोई व्यक्ति अपने मन-मस्तिष्क की शांति के लिए अपने मन को स्थिर कर भटकने से रोकता है, तो उसे ध्यान कहते है। ध्यान मोक्ष से पूर्व की अवस्था मानी जाती है। ध्यान क्रिया अष्टांग योग का सातवां अंग है। ध्यान के माध्यम से हम आत्मसाक्षात्कार होते है। अगर सीधे शब्दों में बोलें तो ध्यान मोक्ष का द्वार है।

ध्यान योग हमारे लिए मोक्ष का द्वार खोलता है। ध्यान की जरूर पृथ्वी के हर जीव को हैं, चाहे वह लौकिक जीवन जी रहा हो या फिर अलौकिक जीवन जी रहा हो। ध्यान को सभी दर्शनों व संप्रदायों में श्रेष्ठ माना गया है। ध्यान के कई प्रकार है। हमें स्वस्थ जीवन के लिए अपने-अपने सुविधानुसार ध्यान क्रिया को अपनी जीवन में अपनाना चाहिए। ध्यान के माध्यम से आप कोई भी कार्य कर सकते है। हमारे कई महापुरुषों ने ध्यान के माध्यम से कई महान कार्य किए हैं।

ध्यान शब्द की व्युत्पत्ति ध्यैयित्तायाम धातु से मानी जाती है। ध्यान का तात्पर्य है- आत्मचिंतन और आत्मसाक्षात्कार होना। ध्यान से हम अपने चित्त को एकाग्र करने में सफल होते है। जिससे हमें अपने लक्ष्य की प्राप्त कर सकते है। जब हम अपने किसी कार्य या लक्ष्य पर एकाग्रता या चिंतन करते हैं, तो उसे ध्यान कहते है। ध्यान एक मानसिक प्रक्रिया है, जिससे हमें अपने मानसिक शक्तियों को एक स्थान पर केंद्रित करते है। ध्यान क्रिया को लेकर अलग-अलग विशेषज्ञों का अपना अलग-अलग मत है।

जब हमारी आत्मा चित्त से भिन्न न रहे और चित्त  चेतन से युक्त रहे तो समझ लेना कि आप ध्यान क्रिया के सही दिशा में जा रहे है। हमारे मन का विषय रहित हो जाना भी एक प्रकार से ध्यान है और किसी वस्तु व बात पर विचार ना करना भी ध्यान की श्रेणी में आता है। हमारे एकाग्रचित और शरीर, वाणी और मन के निरोध को भी ध्यान कहा जाता है। ब्रह्म और हमारी आत्मा के चिंतन को ध्यान कहा जाता है। हमारे द्वारा आदर्श लक्ष्य निर्धारित करना और उसमें तन्मय होना भी ध्यान क्रिया है। वैसे हमारे शास्त्रों में ध्यान को सगुण ध्यान व निर्गुण ध्यान में बाँटा गया है। घेरण्ड संहिता में ध्यान को स्थूल ध्यान, ज्योति ध्यान, सूक्ष्म ध्यान में बाँटा गया है। स्थूल ध्यान यानि मूर्तिमय हो जाना या अपने देवताओं का ध्यान करना। ज्योतिर्मय ध्यान यानि तेजोमय ज्योतिरूप ब्रह्म का चिंतन करना। सूक्ष्म ध्यान यानि बिंदुमय ब्रह्म कुंडलिनी शक्ति का चिंतन करना। 

अपने मन के तत्वतः को समझ लेना ही ध्यान होता है। जब हम ध्यान करते है तो हमें ध्यान में ध्येय की प्राप्ति होती है। ध्यान से हमारे क्लेशों का नाश होता है। ध्यान, धारणा और समाधि को संयम कहा गया है। संयम की स्थिरता से प्रज्ञा की दीप्ति का उदय होता है। जिस प्रकार से वायु रहित स्थान में दीपक का प्रकाश फैलता रहता है, ठीक उसी प्रकार ध्यान का नियमित अभ्यास भी हमें आत्मशुद्धि की ओर लेकर जाता है।

ध्यान एक प्रकार से विज्ञान है। जो हमें शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और बौद्धिक रूप से संपूर्ण और सक्षम बनाता है। हमारे समाज में विभिन्न शक्तियों का समुच्चय उपलब्ध है। हर शक्ति के विकास का अपना-अपना तरीका है। इन सभी शक्तियों का संगम ही हम सभी का जीवन है। जब हम ध्यान को अपनी दिनचर्या में शामिल करते है, तो हमारे व्यक्तित्व में विकास की प्रक्रिया गतिशील होती है।

जब हम ध्यान के माध्यम से आत्म साक्षात्कार करते है, तो इसका संबंध ईश्वर से नहीं बल्कि हमारे स्वयं के अनुसंधान से है। ध्यान हमें हमारी पहचान बताती है। ध्यान क्रिया से ही स्वयं को जान पाना संभव है। ध्यान से हम अपनी आत्म तक पहुंच सकते है। आज स्वस्थ और तनाव मुक्त जीवन के लिए सिर्फ ध्यान यानि मेडिटेशन सबसे अच्छा विकल्प है।

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