क्या आप अष्टांग योग के बारे में जानते है ?

जिस प्रकार गणित में योग शब्द का प्रयोग जोड़ने के लिए किया जाता है, ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि में योग शब्द का अर्थ आत्मा का परमात्मा से जोड़ना है। योग यानि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की क्रिया को आठ भागों में बांटा गया है। यही क्रिया अष्टांग योग कहलाती है। हमारी आत्मा में बेहद बिखराव है जिसके कारण हम अपनी आत्मा को परमात्मा से नहीं जोड़ पाते हैं। जिसके लिए हमें योग का नियमित अभ्यास करना चाहिए।

अष्टांग योग परमात्मा को प्राप्त करने का सबसे अच्छा व सुंदर मार्ग है। आपको बता दें- अष्टांग योग के यम और नियम अंग हमारे संसारिक व्यवहार में सिद्धांतिक एकरूपता लाते है। जिससे हमें अपनी आत्मा के करीब आने लगते हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह हमारे पांच यम हैं। इसे सार्वभौम महाव्रत भी कहते है। हमें मन, वचन और कर्मों से एकरूपता होना चाहिए। हमें हमेशा सत्य बोलना चाहिए क्योंकि सत्य बोलना हमारे लिए अच्छा है, मगर सत्य की भाषा भी अच्छी होनी चाहिए। सत्य बोलने से हमारा मन साफ होता है। स्वस्थ जीवन के लिए हमें योग के साथ नियम यानि अनुशासन की जरूरत होती है। अनुशासन हमारे जीवन के अनुशासित करता है। हमें अपने जीवन का पूर्ण कल्याण व शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग के मार्ग पर चलना चाहिए। योग के आठ अंग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि माने गए हैं।

यम के पाँच सामाजिक नैतिकता है- 

1- अहिंसा- हमारे शब्दों से, हमारे विचारों से और हमारे कर्मों से किसी को हानि नहीं होनी चाहिए। 

2- सत्य- हमारे विचारों में हमेशा सत्यता होनी चाहिए।

3- अस्तेय- हमें विचारों व मानसिकता से साफ होना चाहिए।

4- ब्रह्मचर्य- हमें अपनी चेतना से ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर होना चाहिए और अपनी सभी इंद्रियों को अपने वश में करना चाहिए। 

5- अपरिग्रह- हमें अपने जरूरत से अधिक किसी भी चीज को संचय नहीं करना चाहिए।

नियम के पाँच व्यक्तिगत नैतिकता है-

1- शौच- हमें अपने शरीर और मन को हमेशा शुद्ध रखना चाहिए।

2- संतोष- हमें हमेशा मन और आत्मा से संतुष्ट व प्रसन्न रहना चाहिए।

3- तप- हमें खुद को अनुशासित करना चाहिए।

4- स्वाध्याय- हमें आत्मचिंतन करना चाहिए।

5- ईश्वर प्रणिधान- हमें हमेशा ईश्वर के प्रति श्रद्धा व समर्पित होना चाहिए।

आसान- हमारे शरीर को साधने का तरीका हैं। सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा जाता है। आसन कई प्रकार के हो सकते है। वैसे आसन हठयोग के मुख्य विषय है।

प्राणायाम- योग के लिए नाड़ी साधन व उन्हें जागृति करना प्राणायाम है। प्राणायाम हमारे मन की चंचलता पर विजय प्राप्त करने के लिए बेहद कारगर हथियार है।

प्रत्याहार- अपने इंद्रियों को अंतर्मुखी करना और अपने एकाग्रता का अनुसरण करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार से हम अपने इंद्रियों को वश में कर पूर्ण विजय प्राप्त कर सकती हैं। हमारे चित्त के निरुद्ध हो जाने से हमारी इंद्रियाँ बंद हो जाती है। जिससे हम सही से अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते है।

धारणा- हमें अपने मन को एकाग्रचित करके अपने लक्ष्य पर ध्येय लगाना है। इस दौरान हमें अपना ध्यान किसी एक विषय पर बनाए रखना है यानि किसी एक धारणा पर चलना है। 

ध्यान- जब हमारा मन किसी स्थान या वस्तु पर निरंतर स्थिर रहता है और जब हमारी ध्येय किसी वस्तु व स्थान पर चिंतन करती है तो उसे ध्यान कहा जाता है।

समाधि- यह चित्त की अवस्था है, जिसमें हमारा ध्येय किसी वस्तु के चिंतन में पूर्ण रूप से लीन हो जाता है। समाधि के माध्यम से ही हम मोक्ष की प्राप्ति कर सकते है। योग और ध्यान क्रिया से हम स्वस्थ व शांतिपूर्ण जीवन जी सकते है। इसलिए हम सभी को योग व मेडिटेशन को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए।  

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